सत्ता की छाया में पेड़ों का कत्ल!

मझौली में रातों-रात यूकेलिप्टस गायब, सरपंच-पति बेखौफ
पुलिस-प्रशासन और वन विभाग मौन — क्या कानून पर भारी हो गई सत्ता?
शहडोल।
यह मामला अब केवल अवैध पेड़ कटाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पंचायती सत्ता की दबंगई, पुलिस की निष्क्रियता और वन विभाग की रहस्यमय चुप्पी का ऐसा उदाहरण बन चुका है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्राम पंचायत मझौली से सामने आए दस्तावेज़, ग्रामीणों के बयान और लिखित शिकायतें इस बात की ओर इशारा कर रही हैं कि क्या प्रभावशाली लोगों के सामने कानून, वन अधिनियम और प्रशासनिक नियम बेमानी साबित हो रहे हैं।
पीड़ित गोपाल रजक के अनुसार, उनकी निजी पट्टे की भूमि खसरा नंबर 7/8 तथा शासकीय सड़क किनारे लगे करीब 22 बहुमूल्य यूकेलिप्टस पेड़ रातों-रात काट लिए गए। कटाई से पहले न तो किसी प्रकार की वैधानिक अनुमति ली गई, न कोई नोटिस जारी किया गया और न ही वन विभाग, तहसील या पंचायत की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया। पेड़ों की अनुमानित कीमत 50 से 60 हजार रुपये बताई जा रही है, लेकिन गांव में 40 हजार रुपये का आंकड़ा उछालकर पूरे मामले को हल्का दिखाने की कोशिश की गई।
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायतकर्ता और ग्रामीणों के बयानों में लगातार सरपंच के पति राजभान सिंह का नाम सामने आ रहा है। आरोप है कि फर्जी तरीके से सरपंच के नाम का लेटर जारी किया गया, जिसमें खसरा नंबर तक दर्ज था। बिना तहसीलदार की स्वीकृति, बिना नीलामी प्रक्रिया और बिना वन विभाग की अनुमति यूकेलिप्टस लकड़ी की कटाई कराई गई। बताया जा रहा है कि लकड़ी का परिवहन ठेकेदार सोहन पटेल, नवीन रजक के ट्रैक्टर और 407 वाहन के माध्यम से किया गया। यदि सरपंच-पति की कोई भूमिका नहीं है, तो फिर हर शिकायत, हर दस्तावेज़ और हर बयान में वही नाम क्यों सामने आ रहा है — यह सवाल अब सार्वजनिक हो चुका है।
पीड़ित का यह भी आरोप है कि जब उसने कटाई पर आपत्ति दर्ज कराई, तो उसे खुलेआम धमकाया गया। कथित तौर पर कहा गया कि
“मैं सरपंच का पति हूं, पंचायत के पेड़ हैं। ज्यादा बोलोगे तो ग्रामसभा से पट्टा निरस्त करा दूंगा।”
यह बयान न केवल आपराधिक धमकी की श्रेणी में आता है, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था, वन कानून और प्रशासनिक ढांचे को खुली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
गोपाल रजक ने मामले की शिकायत 112 पर कॉल कर की। पुलिस वाहन मौके पर पहुंचा, कुछ देर के लिए गतिविधि रुकी, लेकिन पुलिस के जाते ही कटाई दोबारा शुरू हो गई। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या यह महज़ लापरवाही थी या फिर किसी स्तर पर पहले से सब कुछ “मैनेज” था। पुलिस की इस भूमिका ने उसकी निष्पक्षता पर सीधा संदेह खड़ा कर दिया है।
इतना ही नहीं, इस पूरे मामले में वन विभाग की भूमिका भी गंभीर सवालों के घेरे में है। अवैध कटाई की सूचना के बावजूद मौके पर कोई त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं हुई, यूकेलिप्टस लकड़ी बिना रॉयल्टी और परमिट के कैसे परिवहन हुई और क्या जानबूझकर आंखें मूंदी गईं — इन सवालों का अब तक कोई जवाब सामने नहीं आया है। वन कानून की यह चुप्पी खुद संदेह के घेरे में आ चुकी है।
पीड़ित द्वारा केसवाही चौकी में लिखित शिकायत देने के बावजूद न FIR दर्ज की गई, न पंचनामा बनाया गया और न ही लकड़ी जब्त की गई। आरोपी पक्ष खुलेआम घूम रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून सिर्फ़ आम आदमी के लिए है, और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग पैमाना है?
उधर ग्राम पंचायत मझौली द्वारा जारी प्रमाण-पत्र में यह दावा किया गया है कि पंचायत ने किसी प्रकार की कटाई नहीं कराई। यदि ऐसा है, तो फिर कटाई किसने कराई, यूकेलिप्टस लकड़ी कहां गई, पैसा किसकी जेब में गया और रॉयल्टी व परमिट की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई — इन सवालों के जवाब अब भी अधर में हैं।
तहसील, पुलिस और वन विभाग — तीनों की चुप्पी इस आशंका को और मजबूत करती है कि यह मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि संभावित संरक्षण का है। यह प्रकरण अब सिर्फ़ एक व्यक्ति की शिकायत नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता, पुलिस की भूमिका और वन विभाग की जिम्मेदारी की सीधी परीक्षा बन चुका है।
अब सवाल सीधे सिस्टम से है —
क्या निष्पक्ष जांच होगी?
क्या सरपंच-पति से पूछताछ होगी?
क्या पुलिस और वन विभाग की भूमिका की जांच होगी?
या फिर यूकेलिप्टस के पेड़ों की तरह यह मामला भी चुपचाप काट-छांट कर दफना दिया जाएगा?
यह समाचार उपलब्ध दस्तावेज़ों, लिखित शिकायतों एवं स्थानीय तथ्यों पर आधारित है। आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच के पश्चात ही संभव है। प्रशासन, पुलिस एवं संबंधित पक्षों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।