“खुली खदान, बंद ज़मीर: एसईसीएल की लापरवाही से 13 गौवंशों की मौत”

“काले हीरे का खून: अमलाई ओसीएम में मुनाफ़े की कीमत पर 13 गौवंश बलि”
महज दिखावे की सुरक्षा, एसईसीएल की खुली खदान बनी गौवंशों की कब्रगाह
धनपुरी/शहडोल।काले हीरे के अथाह भंडार पर बैठा एसईसीएल प्रबंधन एक बार फिर मानवीय संवेदनाओं और नैतिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह बेपरवाह नजर आया है। सोहागपुर क्षेत्र अंतर्गत अमलाई ओसीएम खुली खदान में 13 गौवंशों की दर्दनाक मौत ने न सिर्फ एसईसीएल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है, बल्कि उस अंधे प्रबंधन को भी बेनकाब कर दिया है, जो ज्यादा उत्पादन और ज्यादा मुनाफ़ा दिखाने की होड़ में मूक प्राणियों की जान को सरेआम कुचल रहा है।
यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले इसी खदान क्षेत्र में 8 गायों की मौत का मामला अभी पूरी तरह सुलझा भी नहीं था कि एक बार फिर रहस्यमय परिस्थितियों में 13 गौवंशों की सामूहिक मौत ने पूरे नगर को झकझोर कर रख दिया। नगर में खबर फैलते ही सनसनी फैल गई, लोग सड़कों से लेकर चाय-चौपाल तक सवाल पूछते नजर आए—आखिर यह सिलसिला कब थमेगा?
अमलाई ओसीएम खुली खदान में न तो फेंसिंग है, न चारदीवारी, न चेतावनी संकेत और न ही किसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था। नगर क्षेत्र की गायें रोज़ की तरह घास-चारा तलाशते हुए खदान क्षेत्र में पहुंच जाती हैं और जाहरीला पानी पी कर तड़प-तड़प कर दम तोड़ देती हैं। इसे अब दुर्घटना कहना सच्चाई से मुंह फेरना होगा, क्योंकि बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं इसे एक सुनियोजित लापरवाही का रूप दे चुकी हैं।
पूरे मामले की शिकायत अटल कामधेनु गौ सेवा संस्थान के कार्यकर्ताओं द्वारा की गई है। संस्थान के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने कई बार एसईसीएल प्रबंधन को इस खतरे से अवगत कराया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, जमीन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। गौ सेवा संस्थान के गौरम राम दुबे ने साफ शब्दों में कहा कि एक बार गलती हो सकती है, लेकिन बार-बार गौवंशों की मौत होना गंभीर आशंकाओं को जन्म देता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रबंधन जानबूझकर मामले को दबाने की कोशिश करता रहा है, ताकि जिम्मेदारी तय न हो सके।
घटना की सूचना मिलते ही थाना धनपुरी पुलिस मौके पर पहुंची। थाना प्रभारी खेम सिंह पेंन्द्रो ने कहा कि पीएम रिपोर्ट आने के बाद ही वास्तविक कारण स्पष्ट होगा और दोषियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जब पहले की घटनाओं में भी जांच और रिपोर्ट की बातें हुईं, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि खबर लिखे जाने तक कालरी प्रबंधन का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है। क्या यह चुप्पी लापरवाही की स्वीकारोक्ति है या फिर जांच से पहले ही मामले को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अमलाई ओसीएम के सब एरिया मैनेजर द्वारा उत्पादन और मुनाफ़े के आंकड़े बढ़ाने के दबाव में सुरक्षा मानकों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। खदान को खुला छोड़ दिया गया है, ताकि काम में कोई रुकावट न आए, भले ही उसकी कीमत मूक प्राणी अपनी जान देकर चुकाएं।
आज सवाल सिर्फ 13 गौवंशों की मौत का नहीं है, सवाल उस सिस्टम का है जो करोड़ों के कारोबार के सामने जीवन को तुच्छ मानता है। अगर इस बार भी जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि एसईसीएल प्रबंधन की लापरवाही को सरकारी संरक्षण प्राप्त है और गौवंशों की मौतें यूं ही मुनाफ़े की बलि चढ़ती रहेंगी।
अब देखना यह है कि क्या इस बार जांच सिर्फ काग़ज़ों तक सिमट जाएगी या फिर अमलाई ओसीएम खुली खदान के जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कर इस सिलसिले पर लगाम लगेगी। नगर की नजरें अब प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन पर टिकी हैं।