अदब की महफ़िलें हैं,विचारों की पवित्रता का मंच – जिला न्यायाधीश हिदायत उल्ला खान

बज़्म-ए-साक़ी और इन्शाद फाउंडेशन के संयुक्त तत्वधान में आयोजित मुशायरे में शायरी के साथ दिया गया सुलह, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम
इंदौर – जल्द ही विदा लेने जा रहे साल के आख़िरी सप्ताह में शहर से कुछ दूरी पर सजी एक अदबी महफ़िल ने यह साबित कर दिया कि शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली रूहानी ताक़त है। बज़्म-ए-साक़ी व इन्शाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस शानदार मुशायरे में चुनिंदा शायरों के कलाम ने श्रोताओं को देर रात तक बांधे रखा। दूरी के बावजूद बड़ी संख्या में अदब-प्रेमी मुशायरागाह पहुँचे और हर शे’र पर दिल खोलकर दाद दी।
मुशायरे में इन्शाद के संस्थापक नवीन नवा (मुंबई) ने फ़लसफ़ियाना गहराई से भरे अशआर सुनाए—
“ख़्वाब लगता हूं तो फिर देख मुझे, लुत्फ़ उठा
मैं दिखाई नहीं दूंगा तुझे ता’बीर के बाद”
जिन्होंने श्रोताओं को गहरी सोच में डुबो दिया।
लखनऊ से आए ज़ुबैर अंसारी के सामाजिक यथार्थ को उजागर करते अशआर—
“बेच देंगे हम ज़मीर और मोहतरम हो जाएंगे”
पर ख़ासी तालियाँ बजीं।
माधव बर्वे (दुबई) ने परदेस में कमाने वाले मज़दूरों की पीड़ा को बेहद मार्मिक अंदाज़ में रखा—
“पहुंचूंगा वतन कब तक, न फिर नंबर बदल जाए”
नवीन नीर (चंडीगढ़)और रईस अनवर इंदौरी ने अपने सशक्त और विचारोत्तेजक अशआर से माहौल को गंभीरता और संवेदना से भर दिया। मुशायरे के संयोजक तजदीद साक़ी के इन अशआर को खासी दाद मिली – मैं इसलिए भी कई रात से नहीं सोया,वह मेरे ख़्वाब कुचलता हुआ निकलता है।
रईस अनवर का यह शे’र विशेष रूप से सराहा गया—
“हिंदू और मुस्लिम को बांटा जा सकता है
क्या पत्थर क़ैंची से काटा जा सकता है”
प्रख्यात शायर सतलज राहत ने बेहतरीन निज़ामत करते हुए हर मौके के मुताबिक मौज़ूं अशआर पेश किए। उनका शे’र—
“एक दिन यह कमाल हो ही गया,
सबसे रिश्ता बहाल हो ही गया”
श्रोताओं की ज़ुबान पर छा गया।
फ़ाज़िल फ़ैज़ (भोपाल) के तीखे व्यंग्यात्मक शे’र को भी खूब सराहना मिली।
न्याय, सुलह और संवाद का संदेश –
मुशायरे के दूसरे दौर की सदारत जिला न्यायाधीश हिदायत उल्लाह खान ने की। अपने प्रेरक उद्बोधन में उन्होंने कहा कि—
“अदब की महफ़िलें विचारों की पवित्रता का मंच होती हैं। यदि हम अदालतों के चक्कर काटने के बजाय आपसी सुलह, राज़ीनामा, मीडिएशन और लोक अदालत के माध्यम से अपने विवादो को सुलझाएँ, तो यह हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में भी सहायक होगा।”
उनके इस संदेश के साथ जमीनी विवादों पर तरन्नुम में पढ़ा गया यह शे’र कि, खड़े थे हाथों में तलवार लेकर, क़लम से मिल गया रस्ता हमारा, श्रोताओं के बीच गहरी सराहना का विषय बना।
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार, लेखक व अनुवादक जावेद आलम ने दिवंगत शायर रशीद इंदौरी पर भावपूर्ण मज़मून पढ़ा। कार्यक्रम में वरिष्ठ समाजसेवी मुनीर अहमद ख़ान का गरिमामय इस्तक़बाल भी किया गया।
कार्यक्रम के पहले दौर में स्थानीय शायरों ने अपना कलाम पेश किया। इस दौर में आर.डी.माहौर ‘राही’,दिनेश दानिश, सरफ़राज़ नूर, साहिल रज़ा, आबिद हद्दाद, विशाल तजदीद, विजया कुशवाह, प्रेम सागर और ज़ैद अली ख़ान ने भी अपने अशआर से महफ़िल को रौनक़ बख़्शी। निज़ामत एस. कमाल ने की।
मुशायरा अदब, विचार, इंसानियत और सामाजिक सौहार्द के संदेश के साथ देर रात तक जारी रहा और श्रोताओं के दिलों में एक गहरी छाप छोड़ गया।