प्रकृति में जनजातीयों की अटूट आस्था, देवी-देवताओं के वास से जल-जंगल का हो रहा संरक्षण व संवर्धन: मंत्री रामविचार नेताम

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कॉमन्स संवाद सम्मेलन में विशेषज्ञों ने सामुदायिक शासन पर दिया जोर
‘छत्तीसगढ़ कॉमन्स क्विनिंग’ के समापन समारोह में शामिल हुए मंत्री नेताम
रायपुर। आदिम जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि देश के लगभग सभी राज्यों में जनजातीय समुदाय के लोग निवास करते हैं। उन्होंने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 10 करोड़ से अधिक जनजातीय समुदाय हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीयों का जल, जंगल, जमीन, नदी-नालों और पहाड़ों में अटूट आस्था है। जनजातीय समुदाय पेड़-पौधों, नदी-नालों में देवी-देवताओं का वास मानते हैं और इन्हीं संस्कृति और परंपराओं के कारण वनवासी समुदाय प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन में पहले पायदान पर है।
मंत्री नेताम ने नवा रायपुर स्थित जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय संवाद सम्मेलन ‘छत्तीसगढ़ कॉमन्स क्विनिंग’ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए गहन मंथन हुआ है। इस मंथन से प्राप्त निष्कर्षों को नीति निर्माण और जनहित में उपयोगी बनाने के लिए सरकार पूरी तत्परता से कार्य करेगी।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जनजातीय समुदायों की समस्याओं और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स का गठन करने जा रही है, जिसकी कमान स्वयं मुख्यमंत्री संभालेंगे। इसके साथ ही नीतियों के प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन के लिए विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष कार्यान्वयन समिति भी गठित की जाएगी, जो बेहतर समन्वय सुनिश्चित करेगी।
मंत्री नेताम ने पेसा (पंचायत उपबंध अधिनियम) और एफआरए (वनाधिकार अधिनियम) के क्रियान्वयन में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों, विशेषकर सीमाओं के निर्धारण जैसी समस्याओं के समाधान को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा कि हम केवल संसाधनों के उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि उनके संरक्षक भी हैं और उनका उपयोग केवल आवश्यकताओं तक सीमित होना चाहिए। इस टास्क फोर्स का उद्देश्य जनजातीय कल्याण से जुड़ी नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं को दूर कर समुदायों को उनके अधिकार दिलाना है।
आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने कहा कि यह टास्क फोर्स पेसा और वनाधिकार अधिनियम के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करेगी। उन्होंने जनजातीय बोली, भाषा और सामुदायिक नेतृत्व को हमारी समृद्ध विरासत बताया और कहा कि जल, जंगल, जमीन के संरक्षण में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। जनजातीय समाज प्रकृति को मां और देवता के रूप में पूजता है, जिससे उनके जीवन के हर पहलू में संरक्षण की भावना समाहित रहती है।
दो दिनों तक चले इस सम्मेलन में छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों के 300 से अधिक प्रतिभागियों, नीति विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और ग्राम प्रमुखों ने भाग लिया। चर्चा का मुख्य केंद्र राज्य की लगभग 70 लाख एकड़ ‘कॉमन्स’ भूमि रही, जो ग्रामीण और जनजातीय जीवन की आधारशिला है। विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में कार्य किए जा रहे हैं।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक वी. श्रीनिवास राव ने कहा कि सामुदायिक सहयोग के बिना वनों और जैव विविधता की रक्षा संभव नहीं है। मनरेगा आयुक्त तारण प्रकाश सिन्हा ने जल संरक्षण को जनजातीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बताते हुए समुदायों को इससे जोड़ने पर बल दिया। वहीं रायपुर कलेक्टर गौरव सिंह ने कहा कि जल संरक्षण पारंपरिक ज्ञान पर आधारित एक सरल प्रक्रिया है।
सम्मेलन में यह बात उभरकर सामने आई कि ‘कॉमन्स’ केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आधार भी हैं। इस अवसर पर जनजातीय लोकगीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के संरक्षण हेतु विशेष स्टूडियो स्थापित करने की योजना भी साझा की गई।
कार्यक्रम को सफल बनाने में अपर संचालक संजय गौड़ और टीआरटीआई की संयुक्त संचालक गायत्री नेताम का विशेष योगदान रहा। यह आयोजन आदिम जाति विकास विभाग, टीआरटीआई और फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया, जिसमें विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों का सहयोग रहा।

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