ककनार घाटी के नीचे थमा लाल आतंक का शोरअब गूंजती है बस की हॉर्न

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रायपुर। बस्तर की भौगोलिक विषमताओं और कठिन परिस्थितियों के बीच विकास की एक नई इबारत लिखी गई है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक नामुमकिन थी। ककनार घाटी के नीचे बसे सुदूर गांव—कुधूर, धरमाबेड़ा, चंदेला, ककनार और पालम, जो कभी वामपंथी आतंक के गढ़ माने जाते थे, आज मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा के माध्यम से मुख्यधारा से जुड़ गए हैं।
इन गांवों के निवासियों के लिए पक्की सड़क का निर्माण एक ऐसा सपना था, जिसके बारे में सोचना भी कठिन था। घाटी की दुर्गम ढलान और माओवाद के साये ने विकास के हर रास्ते को अवरुद्ध कर रखा था। लेकिन आज उन्हीं संकरी पगडंडियों और चुनौतीपूर्ण रास्तों पर बनी नई सड़क पर बस का दौड़ना बस्तर की बदलती तस्वीर का सशक्त प्रमाण बन गया है।
मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा योजना के तहत जिले के चयनित मार्गों पर बस सेवा संचालित की जा रही है। यह बस सेवा केवल एक वाहन नहीं, बल्कि विश्वास और विकास की एक मजबूत कड़ी है। स्वीकृत समय-सारणी के अनुसार यह बस प्रतिदिन कोण्डागांव जिले के मर्दापाल से अपनी यात्रा शुरू करती है और ककनार घाटी के नीचे बसे गांवों को जोड़ते हुए धरमाबेड़ा और ककनार जैसे पड़ावों से गुजरकर संभाग मुख्यालय जगदलपुर तक पहुँचती है।
इससे उन लोगों का सफर अब सुगम हो गया है, जिन्होंने दशकों तक सड़क और बस का इंतजार किया था। वामपंथी समस्या के कमजोर पड़ने और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते अब इन संवेदनशील इलाकों में सड़कों का निर्माण संभव हो पाया है। पक्की सड़कों के इस नेटवर्क ने न केवल परिवहन को आसान बनाया है, बल्कि ग्रामीणों के मन से अलगाव का डर भी खत्म किया है।
अब शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार के लिए ग्रामीणों को मीलों पैदल सफर तय नहीं करना पड़ता। यह बस सेवा इस बात का प्रतीक है कि बस्तर का वह हिस्सा, जो कभी अंधेरे में खोया हुआ माना जाता था, अब तेज़ी से प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहा है।
चंदेला के सरपंच तुलाराम नाग के अनुसार, कुछ समय पहले तक इस क्षेत्र में माओवादी समस्या के कारण विकास थम गया था, लेकिन अब सड़क बनने से विकास को नई दिशा मिली है। क्षेत्र में स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य सेवाएं और उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से आवश्यक सामग्री उपलब्ध हो रही है। वहीं ककनार में साप्ताहिक बाजार की रौनक भी बढ़ गई है।
ककनार के सरपंच बलीराम बघेल बताते हैं कि पहले तहसील मुख्यालय लोहण्डीगुड़ा और जिला मुख्यालय तक पहुंचना कठिन था, लेकिन अब सड़क बनने से वर्षभर आवागमन की सुविधा उपलब्ध हो गई है।

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