सफलता की कहानीस्व-सहायता समूह की ताकत से चमकी किस्मत,साधारण गृहिणी से सफल उद्यमी बनीं सीता बाई

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एमसीबी/12 मार्च 2026/ 
अगर हौसला मजबूत हो और सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो साधारण परिस्थितियों से भी सफलता की नई राह बनाई जा सकती है। जिले के विकासखंड मनेन्द्रगढ़ के संकुल केल्हारी अंतर्गत ग्राम चरवाही की निवासी श्रीमती सीता बाई ने इसी विश्वास के साथ अपने जीवन की दिशा बदल दी। एक समय साधारण गृहिणी के रूप में सीमित संसाधनों में जीवन यापन करने वाली सीता बाई आज स्व-सहायता समूह की शक्ति और “बिहान – छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (

NRLM)” के सहयोग से आत्मनिर्भर बनकर गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं।
बिहान योजना से जुड़कर बदली जिंदगी
ग्राम चरवाही में शिव शंकर महिला स्व-सहायता समूह का गठन 23 जनवरी 2018 को बिहान योजना के अंतर्गत किया गया था, जिसमें 10 महिलाएं सदस्य के रूप में जुड़ीं। विकासखंड मिशन प्रबंधन इकाई के मार्गदर्शन और प्रशिक्षण से समूह की महिलाओं को आजीविका के विभिन्न अवसरों से जोड़ा गया। इसी दौरान सीता बाई भी इस समूह से जुड़ीं और प्रारंभ में समूह की अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाएंगी और आत्मनिर्भर बनेंगी।
दुकान, मुर्गी पालन और सेंट्रिंग प्लेट से बढ़ी आय
समूह को प्राप्त आरएफ और सीआईएफ राशि में से लगभग 60 हजार रुपये की सहायता लेकर सीता बाई ने अपने गांव में एक छोटी किराना दुकान शुरू की। धीरे-धीरे दुकान चलने लगी और यह उनके लिए स्थायी आय का साधन बन गई। दुकान से उन्हें प्रतिमाह लगभग 10 हजार रुपये की आय होने लगी, जिसमें करीब 6 हजार रुपये शुद्ध लाभ के रूप में प्राप्त होता है। इसके साथ ही उन्होंने मुर्गी पालन और सेंट्रिंग प्लेट का कार्य भी शुरू किया। इन गतिविधियों से उन्हें प्रतिमाह लगभग 10 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय होने लगी। इस प्रकार अपनी मेहनत और लगन से सीता बाई ने आजीविका के कई स्रोत विकसित कर लिए।
समूह की शक्ति से मिली आर्थिक मजबूती
शिव शंकर महिला स्व-सहायता समूह को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से 15 हजार रुपये की आरएफ राशि, 60 हजार रुपये की सीआईएफ राशि तथा 3 लाख रुपये का बैंक ऋण प्राप्त हुआ। इसी सहयोग से समूह की महिलाओं ने अपने-अपने व्यवसाय शुरू किए और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ीं। सीता बाई ने भी अपने व्यवसाय में लगभग 80 हजार रुपये का निवेश कर मजबूत आजीविका आधार तैयार किया।
लखपति दीदी बनकर बनीं प्रेरणा
आज सीता बाई अपनी दुकान, मुर्गी पालन और सेंट्रिंग प्लेट के माध्यम से लगभग 1.60 लाख रुपये की वार्षिक आय अर्जित कर रही हैं। कभी साधारण गृहिणी के रूप में जीवन बिताने वाली सीता बाई आज अपने गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा की मिसाल बन चुकी हैं। वे अन्य महिलाओं को भी स्व-सहायता समूह से जुड़कर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हैं।
सीता बाई का कहना है कि उन्होंने अपने परिवार के लिए जो सपना देखा था, वह मेहनत, आत्मविश्वास और समूह के सहयोग से आज साकार हुआ है। “बिहान” योजना ने उन्हें न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनाया, बल्कि आत्मविश्वास और सम्मान से भरा नया जीवन भी दिया। सीता बाई की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि महिलाओं को सही मार्गदर्शन, अवसर और सामूहिक सहयोग मिले तो वे न केवल अपने जीवन को बदल सकती हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन सकती हैं।

समाचार क्रमांक/167/लोकेश/फोटो/09 से 11

सफलता की कहानी

हौसले ने बदली तकदीर: मुर्गी पालन से आत्मनिर्भर बनीं ग्राम जमथान की सकून मौर्या

एमसीबी/12 मार्च 2026/ मजबूत इरादे और मेहनत के साथ यदि सही अवसर मिल जाए तो साधारण परिस्थितियों में रहने वाला व्यक्ति भी सफलता की नई कहानी लिख सकता है। जिले के ग्राम जमथान की निवासी श्रीमती सकून मौर्या ने अपने आत्मविश्वास, मेहनत और स्व-सहायता समूह के सहयोग से यही साबित कर दिखाया है। आज वे मुर्गी पालन के माध्यम से आत्मनिर्भर बनकर गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं।

साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाली सकून मौर्या पहले अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित रहती थीं। इसी दौरान वे महामाया महिला स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें बचत, बैंकिंग और स्वरोजगार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने कुछ नया करने का निर्णय लिया। समूह के सहयोग और मार्गदर्शन से उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के माध्यम से 1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। इस राशि का उपयोग करते हुए उन्होंने मुर्गी पालन का कार्य शुरू किया। शुरुआत में यह एक छोटा प्रयास था, लेकिन अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने इस कार्य को धीरे-धीरे सफल व्यवसाय में बदल दिया।

आज मुर्गी पालन उनके परिवार की आय का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है। इस व्यवसाय से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 93 हजार रुपये की आय प्राप्त हो रही है। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है और वे अपने परिवार की आवश्यकताओं को पहले से बेहतर तरीके से पूरा कर पा रही हैं। सकून मौर्या की सफलता को देखकर गांव की कई महिलाएं भी स्व-सहायता समूह से जुड़कर स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित हो रही हैं। उनका कहना है कि समूह से जुड़ने के बाद उन्हें न केवल आर्थिक सहायता मिली, बल्कि आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिली।

सकून मौर्या की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि महिलाओं को सही मार्गदर्शन, अवसर और सहयोग मिले तो वे अपनी मेहनत और संकल्प से जीवन की दिशा बदल सकती हैं और आत्मनिर्भर बनकर समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती हैं।

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