अवैध शराब का साम्राज्य: मनेन्द्रगढ़ में कानून निष्प्रभावी, माफिया बेखौफ

मनेन्द्रगढ़ (एमसीबी)।
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रदेशभर में अवैध शराब के विरुद्ध लगातार सख्त अभियान चलाए जाने के दावों के बीच मनेन्द्रगढ़ अंचल की जमीनी हकीकत इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है। यहां अवैध शराब का कारोबार इस कदर बेखौफ तरीके से फल-फूल रहा है कि मानो कानून, प्रशासन और नियंत्रण तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका हो।
राज्य आबकारी अधिनियम एवं शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद क्षेत्र में खुलेआम शराब की बिक्री न केवल कानून का मज़ाक उड़ा रही है, बल्कि सरकार के राजस्व हितों को भी भारी क्षति पहुँचा रही है।
गली–गली में शराब, नियमों की खुलेआम अनदेखी
स्थानीय सूत्रों के अनुसार मनेन्द्रगढ़ नगर सहित लेदरी, झागरखाड़, खोगापानी और आसपास के ग्रामीण अंचलों में अवैध शराब की बिक्री धड़ल्ले से जारी है। ढाबों, किराना दुकानों और अस्थायी ठिकानों पर दिनदहाड़े शराब परोसी जा रही है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि यह सब उस क्षेत्र में हो रहा है जहाँ आबकारी विभाग की नियमित तैनाती, चेकिंग व्यवस्था और शासकीय मदिरा दुकानें संचालित हैं।
सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना
अवैध शराब के इस संगठित नेटवर्क से शासन को प्रतिदिन लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। जानकारों का कहना है कि केवल मनेन्द्रगढ़ क्षेत्र में ही प्रतिदिन हजारों लीटर अवैध शराब की खपत हो रही है, जिससे वैध दुकानों की बिक्री पर भी सीधा असर पड़ रहा है। यह स्थिति छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 तथा संबंधित नियमों का खुला उल्लंघन है।
सीमावर्ती इलाकों से तस्करी, जंगल बने सुरक्षित गलियारे
मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ सीमा से लगे दुर्गम जंगल और कच्चे रास्ते शराब माफियाओं के लिए सुरक्षित मार्ग बन चुके हैं। मोटरसाइकिल, पिकअप और चारपहिया वाहनों के जरिए शराब की खेप दिनदहाड़े लाई जा रही है, जिसे बाद में छोटे-छोटे ठिकानों पर खपाया जाता है। यह पूरा नेटवर्क संगठित अपराध की ओर इशारा करता है।
प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल
सबसे गंभीर प्रश्न आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका को लेकर खड़ा हो रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी कथित रूप से शराब माफियाओं से सांठगांठ कर रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर लोगों ने बताया कि कोतमा हाईवे स्थित एक चर्चित ढाबे में आए दिन विभागीय कर्मियों की मौजूदगी देखी जाती है, जहां कथित तौर पर शराब और भोजन के साथ अवैध गतिविधियों की रणनीति बनाई जाती है।
‘जब सैयां ही कोतवाल हों…’
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब कानून के रक्षक ही कानून तोड़ने वालों का संरक्षण करें, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? “जब सैयां ही कोतवाल हो, तो डर किस बात का” — यह कहावत आज मनेन्द्रगढ़ की जमीनी हकीकत को पूरी तरह बयान करती है।
सरकार के लिए गंभीर चेतावनी
यह मामला केवल अवैध शराब तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन की साख, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सीधा प्रहार है। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह अवैध नेटवर्क और अधिक मजबूत होगा, जिससे अपराध, सामाजिक अव्यवस्था और राजस्व हानि लगातार बढ़ती जाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या शासन और प्रशासन इस गंभीर प्रकरण पर ठोस एवं निष्पक्ष कार्रवाई करेगा, या फिर अवैध शराब का यह काला कारोबार यूं ही बेखौफ फलता-फूलता रहेगा?
जनता जवाब की प्रतीक्षा में है।